Tuesday, July 17, 2018

मुखाग्नि-भाग 1



पिछले ऐतवार की बात है, घर पे बैठा टेलीविज़न देख रहा था की माँ का फोन आया| उठाया तो रो रही थी की बाबा की सांस नहीं चल रही है| मैंने बोला घबराइए नहीं,  नहीं तो दादी घबरा जाएँगी, दिल तो मेरा भी धक् से करके रह गया लेकिन शान्ति से काम ले, अपने डॉक्टर दोस्त को फ़ोन किया, उसने बोला की माँ का फ़ोन आया था, और जैसा वो बता रही है उसके हिसाब से बुरी खबर जान पड़ती है| मुझे समझ में नहीं आ रहा था क्या हो रहा है, अंदर गया तो बीवी सो रही थी, मैंने जगाया नहीं| चुपचाप दुसरे कमरे में गया और रोया| इसके पहले ऐसे किसी व्यति का देहांत नहीं हुआ था जिससे मुझे फर्क पड़ता हो| तब तक माँ ने बता दिया की डोक्टर देख के गया है और बाबा नहीं रहें| काफी देर रोया , भाई को फ़ोन किया, वो भी रो रहा था, बोला मैंने घर आ जाओ, साथ पटना चलते है| आनन फानन में टिकट बुक किया| रात भर नींद नहीं आई, बाबा के बारें में सोचता रहा|

पिताजी मेरे काफी समय तक पढाई करते रहे, कमाना देर से शुरु किया था , बाबा नें ही मेरी पढाई करवाई थी| एक एक करके बचपन की सब बातें याद आ रही थी| बाबा मेरे पुलिस में थे , एक बार याद है मुझे छोटा था में, बाबा बारिश में भींग गए थे ड्यूटी से आनें में, वर्दी सब सूखने को डाल के रिवाल्वर टेबल पे रख दिए थे| गोलियां अलग रही थी, शायद सुखाना होगा इसीलिए बाहर रहने दिया होगा| मेरा जिज्ञासु मन, छोटा था में रिवाल्वर उठा के खेलने लगा , बाबा ने देखा तो पिटाई हुई, शायद वही पिटाई थी जो 15 साल बाद जंगल बिहार में बन्दुक से दूर रखी, नहीं तो 200 रुपये में स्कूल में एक लड़का देसी कट्टा बेचता था| खैर काफी कहानिया है|

बहुत साल बाद दुसरे ज़ात की लड़की से शादी कर रहा था, बाबा को जा के बताया, खूब खुशी हुई उनको| कुछ नए लोग नहीं आये, लेकिन बाबा शादी में मंडप के सामने रात भर बैठे रहे, बहुत बार आँखें भर आई थी उनकी खुशी से| बहुत मजबूत आदमी थे, उन्ही ने सिखाया की जो सही लगता है करो , दुनिया के ढकोसलो से मत घबराओ| कम बोलते थे लेकिन बोलते थे तो सब सुनते थे| बहुत समय तक उनके सामने बैठता नहीं था, डर से नहीं इज्जत से|

दुसरे दिन पटना पंहुचा तो घर जाने में डर लग रहा था , ईया (दादी) की बस चीख सुनाई दे रही थी| लोग इधर उधर टहल रहे थे| में घर क पीछे चला गया, अंदर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी| बहुत देर बाद अंदर गया में, दादी का बुरा हाल था, बार बार बेहोश भी हो जा रही थी| सब चुप बैठे थे, माँ ने बताया रात भर से रो रही है, खुद को कोस रही थी की उन्होंने ध्यान नहीं रखा| रोना स्वाभाविक था, लेकिन बाकी लोगो का चुप रहना और उन्हें ये ना समझाना की नहीं आपके कारण कुछ नहीं हुआ है मुझे अच्छा नहीं लगा| नारी को हमारें समाज में अबला बना कर रखा है लोगो ने, पति की मृत्यु के बाद बेचारी बनाने का सारा इन्तेजाम कर रखा जाता है। बहुत देर बाद में गया दादी के पास, पार्थिव शारीर बिजली वाले ठंढे ताबूत में रखा था| दादी रात भर पकड़ के रोती रही थी उसको| समझाने का प्रयत्न किया, आंसू नहीं आने दिए, सोचा में रोऊंगा तो और रोएंगी| रोना आता था तो अंदर कमरे में जा क रो लिया करता था| दादी को वहां से हटाने का प्रयत्न किया, लेकिन वो कहा हटने वाली थी बोली नहीं नहीं मत हटाओ, में नहीं रोउंगी, बस बैठे रहने दो यही, आधे सदी से साथ थे दोनों, इतनी जल्दी नहीं जाने देने वाली थी वो| इतने में कुछ लोग आयें और रोते चीखते हुए दादी से गले लगने लगे | मुझे बहुत गुस्सा आया की बड़े डर बाद चुप हुई थी फिर रो देंगी इसीलिए 2-3 बार चिल्ला भी दिया लोगो पे| दादी के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा था, बाकी दुनिया का कोई मतलब नहीं था मुझे|
बहुत देर बाद सब बक्सर के लिए निकले , खानदान में सबका दाह संस्कार वही हुआ था इसीलिए इतना इंतज़ार हुआ, पटना में करते तो शायद दादी थोड़ा कम रोती।

पहली बार शमशान घाट गया था, समझ में नहीं आया क्या हो रहा था, पण्डे झगडा कर रहे थे की आपका गाँव का पंडित नहीं करवाएगा पूजा, हमारा घाट है| रिश्तेदार पंडिताई झाड़ रहे थे, चिल्ला चिल्ली हो रही थी, एक गाँव का लड़का तो चिता पे रखने क बाद सेल्फी भी ले रहा है| लिखते हुए भी इतना गुस्सा आ रहा है, उस समय कैसे खुद को रोका मारने से में ही जानता हूँ| सबपे गुस्सा आ रहा था, सोच रहा था की प्रलय हो जाये सब मर जाएँ वहीँ पे| कुछ देर में लोग बात करने लगे की देवदार की लकड़िया कितनी अच्छी जलती रही है जैसे पेट्रोल हो| मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था| सामने आसमान लाल था, गंगा की गंदगी उस लाली में दिख नहीं रही थी, चिता इतनी तेज़ थी की अपवर्तन से दूर नज़र डालने पे आसमान धूमिल हो रही थी| कुछ वक़्त के लिए साब शांत हो गए थे, पण्डे, गाँव के लोग, बस डोम लगा हुआ था की शारीर अच्छे से जल जायें, वैतरणी पार करना था| पिताजी बस बैठे हुए थे| बाबा कुछ समय से बीमार चल रहे थे, मुझे मालूम था की अब बस समय की बात है , लेकिन पिताजी लगे रहते थे, सुबह 4 बजे से दिन शुरु होता था उनका, बाबा को नहला धुला के बिठा देते थे, नास्ता खिला के भजन सुनते थे फिर कोर्ट जाते थे, दिन में 2 बार वापस आतें थे खाना खिलाने, बात करते थे| रात में 2 बार उठ के करवट बदलते थे बाबा का| मुझे बोलते थे देख लेना ठीक कर दूंगा में सेवा कर के| लिखते लिखते कंप्यूटर से स्क्रीन धूमिल गयी मेरी|

वापस घर आनें वक़्त हँसी मज़ाक चल रहा था, लेकिन शायद ऐसे ही हमारे समाज में दर्द छुपाना सिखाया गया है मर्दों को, या शायद ऐसा ही होता हो, लोग भूल जातें है| में नहीं भूलना चाहता हूँ| में याद रखना चाहता हूँ| कुछ बाबा की कहानियाँ भी सुनने को मिली रास्ते में, जब बाबा जवान थे, किसी की शादी थी गाँव में, डकैत आने की आशंका थी, रात भर रिवाल्वर ले के अकेले बैठे रहे बाबा, खैर डकैत किसी और घर लूट कर चले गए, वैसे 15 दिन के अंदर बाबा के ने पकड़ लिया था उन्हें , थाने में बंद कर के धुलाई भी की| सोचने की कोशिश की वो दिन कैसा होगा , लेकिन आज का दिन जा नहीं रहा था आँखों से, बस कुछ राख बची अंतिम में, गंगा में डाल के लौट रहे थे हमलोग|

अब बस दादी की चिंता थी, अगले 10 दिन धर्म के नाम तमाशा होगा, दान होगा , दादी को दिन रात याद दिलाया जायेगा की उनके पति नहीं रहे| बहुत क्रूर समाज है हमारा, पंडित पंडिताई करेगा और हम सब मानेंगे सोच के की कुछ गलती ना हो जाये, आत्मा की शान्ति भी जरूरी है| में बनारस चला आया कुछ दिन काम से, सोचा मुझसे नहीं देखा जायेगा ये ढकोसले, पंडित और गाँव के लोगो तो मार दूंगा तो अलग काण्ड होगा, दिन भर काम करता था, रात में भांग पी के सो जाता था| काफी सोचने को मिला इन कुछ दिनों|
ट्रेन में हूँ घर जा रहा हूँ , श्रध्कर्म है| बस दादी को पकड़ के बोलूँगा की दादी, तुमहारे सामने बड़े बड़े की बोली नहीं निकलती है, ऐसा मत सोचना आज भी कुछ बदला है, ऐसे ही रहना, आग लगे दुनिया में|

शायद ना भी बोल पाऊ, मर्दों को ज्यादा भावना व्यक्त करना नहीं सिखाया है, ज्यादा भावना दिखाने वाला नपुंसक जो होता है, ऐसा ही सुना है मैंने| शायद बोल भी दूँ, बाबा अपनी भावनाएं दिखाते थे, बहुत बार दुःख या ख़ुशी में उनकी आँखे चमक जाती थी, कोने से देखा है मैंने...





1 comment:

Unknown said...

यथार्थ तो यही है, कटु सत्य भी।लेकिन हमारे समाज के रीति रिवाज और धूमिल होती पुरानी प्रथा _ शायद समाज ऐसे ही आगे बढ़ता रहा कुछ ना कुछ सुधारो के साथ । (आपने अपने अनुभव को बहुत ही अच्छी तरह है )