माँ को ट्रेन
से ही भाग 1 भेजा मैंने, थोड़ी देर बाद उनका सन्देश
आया, बोली पढ़ा और बहुत रोना आया, फिर पुछा की और किसी को तो नहीं भेजे ना? जानें कौन बुरा मान जाएँ| औरत का मन ऐसा बना दिया है समाज ने, हमेशा डरा सा
रहता है| मुझ नास्तिक के घर भी आती है तो अपने भगवान् को
छुपा के रखती है| अब तो सोच रहा उनके लिए पूजा
घर बनवा दूंगा, मेरी नहीं तो क्या उनकी श्रध्दा है| हाँ व्यर्थ के ढकोसले नहीं करने दूंगा कभी, पेट में उल्सर है
और बृहस्पत का व्रत करना है| खैर, मैंने कहा माँ चिंता मत करो तुम, जिसे अच्छा लगता हो अच्छा लगे जिसे ना लगता हो ना लगे, मैंने फेसबुक पे डाल दिया है| ट्रेन काफी लेट हो गयी थी मेरी, देर रात घर पंहुचा| छोटी बहनें बैठी
थी, बोली बड़की माँ कुछ पढ़ के रो रही थी , क्या लिखा है आपने, हमे भी पढाओ| मैंने फ़ोन निकाल के दे दिया की पढ़ लो, बच्चे बदले तो शायद अगली पीढी बदले| थोड़ी देर में सबके आंखों से झर झर आंसूं निकलने लगे| रोते रोते गले लगा लिया उन्होंने, सबसे छोटी वाली तो इतना रोने लगी की सांस चढ़ने लगी उसकी, में थोडा घबरा भी गया था|
सुबह मुंडन
होना था| दादी के लिए सादे रंग की साड़ी रखी हुई थी| सुबह सुबह चला गया में जहाँ मुंडन होना था| वह भी अजीब सा माहोल था, कुछ घड़े रखे हुए थे| मुझे अचानक बचपन की कुछ
बातें याद आ गयी| सुबह सुबह मुझे बरसो पहले
की एक घटना याद आई| बहुत साल पहले मेरे घर के
सामने कुछ लोग, बाल छिलवा के एक घड़ा रख के गए थे, शायद कुछ रिवाज़ होगा , किसी के घर
कोई मृत्यु हुई थी| मेरे दोस्तों ने बोला की
तुम्हारे घर अब भूत आएगा, में काफी डर गया था| दादी को बताया तो उन्होंने उन लोगो से बोल के घड़ा हटवा
दिया| में सोच रहा था उन्हें कैसा लगा होगा| हम भी कम क्रूर नहीं है’| हालाँकि बाद में बाबा को मालूम चला तो उन्होंने बोला किसी के दुःख के समय ऐसा
नहीं करना चाहिए था|
में सलून में
बाल छीलवाने आ गया, गाँव का नाई पे मुझे भरोसा
नहीं था, साला बाल के साथ चमड़ी भी ना छील दे| घर वापस आया तो नाना बैठे थे| मैंने बोला मेरे कमरे में सो जाइये, हर्निया की परेशानी है दिल के मरीज भी| कमरे में नाना बाबा की कुछ और कहानी बताने लगे| बोले बहुत दया थी उनके मन में, लेकिन रौद्र रूप धारण कर ले तो कौन निरीक्षक और कौन महानिरीक्षक| एक कहानी
बताने लगे, की गाँव से वो माँ को ले के आ रहे थे, रास्ते ने कंडक्टर नें कुछ जेवर चुरा लिए, पूछने पे
चिल्ला चिल्ली करने लगा, डराने धमकाने भी लगा| नाना ने कुछ नहीं बोला, घर गए साइकिल उठाई और अपने
मित्र के साथ गाँधी मैदान थाना आ धमके| बाबा उस समय वहां के
थाना प्रभारी थे| नाना और बाबा की घनिष्ठ मित्रता भी थी| बाबा ने 4 सिपाही को जीप पे बिठाया और बस स्टैंड पहुच गए, उस समय पुलिस की जीप और थाना प्रभारी को देख के हरकंप मच गया| बस तो जा चुकी थी लेकिन बस के मालिक का पता चल गया था, टेलीफोन किया तो अगले दिन मालिक खलासी के साथ वही जेवर ले के आयां| बाबा ने खलाशी को समझा बुझा के जाने दिया की गरीब आदमी है| नाना ने बताया की वो बाबा की बात कभी नहीं काट सकते थे, उनके पिता जी ने मरते वक़्त बोला था की
“दामोदर
आपके बड़े भाई है, समधी नहीं, उनकी बात भगवान् की बात समझना”|
मुझे
भी याद आया की किसी रिश्तेदार की बेटी से बाबा मेरे बड़े मामा की शादी तय करने गए
थे| मामा को शायद अभी शादी का मन नहीं होगा तो
वो सीढियों ये निचे उतर रहे थे ये बोलने को| इतने में कमरे
से बाबा की आवाज़ आई की
“गोपाल
लड़की के पिता नहीं है, शादी कर दीजिये”|
बड़े
मामा ने सुना तो अंदर नहीं गए, बोले पापा
( मेरे बाबा को पापा बोलते थे वो) ने बोल दिया तो बोल दिया|
बोलते
बोलते थोडा भावुक हो गए नाना भी| फिर बताया
की जब उन्हें दिल का दौरा पड़ा था उन्हें शायद बाबा सबसे पहले पहुचे थे, मामा को एटीएम दे के बोला पैसा की चिंता मत करना जो इलाज है करवाना, गोपाल को कुछ होना नहीं चाहिए| मझे भी
रहा नहीं गया सुन के, आँखें भर आई| आजकल लोग समधी का खून चूस लेते है, और बाबा सारा धन
इलाज में लगाने को तैयार थे|
खैर आज बाल छिलवा
के घर पंहुचा तो देखा की दादी सादे रंग की साड़ी पहन चुकी है| देख के लग रहा था की काफी रोई भी है| मेरा पारा चढ़ गया, गुस्से में
स्टील की अलमारी पे एक घुसा दे मारा| मुझे भी भावनाये
व्यक्त करना नहीं आता है| सीख रहा हूँ, बातचीत करना और गुस्सा कम करना|
खैर माँ और
बाकी लोगो खरी खोटी भी सुनाई| उन्होंने बोला
पंडित ने बोला है ऐसा करने को| जी में आया
खून कर दूँ पंडित का| अगर एक खून माफ़ होता तो
शायद कर भी देता| दुःख की घड़ी में जिस आदमी
का हृदय इतना कठोर हो वो पंडित कैसा| बाद में लगा
की माँ और चाची को क्या बोलता हूँ , जब दादी के
बेटो को ये सब नहीं दीखता है तो और किसी को कोई क्या बोले| धर्म के नाम पे क्या क्या खेल होता है| शायद सबकी अपनी मजबूरियां है, में तो चला जाऊंगा बाकी लोगो को इसी समाज में रहना है, लेकिन फिर भी मन नहीं मान रहा , थोड़ी हिम्मत करके लोग ये ढकोसले बंद करा सकते हुई| पिताजी को सुबह बोलने की कोशिश की तो उन्होंने कहा
“ उनके बेटे है
, जो करना है करने दो, तुमको जो करना
होगा करना” सुन के हाड़ कांप गयी|
दादी ने थोड़े
देर बाद बुलाया मुझे| बोली तुम जो होली में साड़ी
लायें थे वही पहनूंगी कल , पंडित को कुछ ना बोलना| बाद में छोटी बहन लोगो ने बताया की कैसे पंडित ने आग में
मूत के रखा है, पाठ करता है और बातें करता है की “जिस घर में
नारी की आवाज़ बाहर सुनाई दे , वैसे घर का
विनाश निश्चित है” , मैंने बोला कूट क्यों नहीं
दिया वही पे, कमजोर सा तो दीखता है, तुम लोगो की संख्या भी ज्यादा है| तो कहने लगी की नहीं भैया बहुत बड़ा शस्त्र है उसके पास, शास्त्र बोलता है उसको, कुछ पूछो तो
बोलता है ये देखो ये इस किताब में लिखा है, और लोग प्रणाम
करते है उस किताब को| मैंने पुछा, पढ़ा क्या किसी ने किताब को? तो बोलने लगी नहीं भैया पढ़ा तो नहीं है|
वैसे काफी
अच्छा व्यापारी भी है पंडित, वक़्त देख के
सौदा करता है, ख़ुशी ज्यादा हो या दुःख, रेट उसका नहीं बदलता| साड़ी एकदम
सफ़ेद होनी चाहिए, नहीं तो आत्मा को शान्ति
नहीं मिलेगी| सारें जीवन का पुण्य एक तरफ और साडी का रंग एक
तरफ| क्या क्या चाहिए उसको, पलंग, कूलर, गाय और सोने की अंगूठी गाय की सींग में होना जरूरी है| लोग सुन भी रहे है दे भी रहे है| मेरे सामने अभी नहीं आया है, नहीं तो शायद उसकी पंडिताई झाड़ दूँ| शायद आदमी
पहचानता है वो , दूर रहता है मेरे से|
बाबा की एक
कहानी याद आ गयी, सुना के ये भाग ख़त्म
करूँगा| बचपन में सुना था केले के पेड़ पे ब्रम्ह प्रेत
रहता है, हमारा मकान बन रहा था उस समय, कोने में एक केले का पेड़ था| रात में उधर जानें में डर लगता था| बाबा को मालूम
चला तो उन्होंने बोला
“प्रेत है की
नहीं ये मालूम नहीं, लेकिन ये तय है, जितना डरोगे उतना डराएगा ये प्रेत”|
आज ये ये कहानी
चरिथार्थ मालूम पड़ती है...
No comments:
Post a Comment