Thursday, December 27, 2018

वो सारे शहर जो बेगाने हो गए

अपनी अभी तक की छोटी सी जिदंगी में कुछ 6 शहरों में रहा हूं में। पटना, भोपाल, दिल्ली, अंगुल, हैदराबाद, और नोएडा। हर शहर की अपनी कुछ बात थी। जीवन के अठारह बसंत पटना में बिताने के बाद जब पढ़ाई करने पहली बार भोपाल गया तो अलग खुशी थी। दो साल वहां गुजरे मेरे और पहली बार एक अलग तरह की आजादी का अनुभव हुआ। ना कोई देखने वाला ना कोई रोकने वाला। उन दो सालों में काफी कुछ किया, पढ़ाई तो खीच तान के की किसी तरह  लेकिन बाकी कुछ बिना खीचा तानी के हुई। नया शहर, नए दोस्त और नई आदते। शहर छान मारा, एम पी नगर से ले के दस नंबर मार्केट, कभी बित्थन कभी न्यू मार्केट। आजादी का पूरा फायदा उठाया। शहर आपना सा लगने ही लगा था कि पढ़ाई ख़त्म हो गई और अलविदा कहने का वक़्त आ गया।

पढ़ के निकला तो नौकरी करनी शुरू की, माता पिता का जो सेफ्टी नेट होता है वो धीरे धीरे ओजोन की परत की तरह पतला होता जा रहा था। ज़िदंगी जब आटे चावल और पिज़्ज़ा का भाव बता रही थी , पर हर शहर ने खुले हाथो से गले लगाया। जैसे जैसे शहर बदलता गया हर शहर की अपनी बातें बनती गई। काफी शहर में लोगों से शिकायते रही लेकिन शहर से कभी नहीं। इक अलग सा लगाव होता रहा। काफी जगह लगाव की भावनाओं ने शहर छोड़ने के बात दस्तक दी लेकिन भावना रही जरूर। कहीं यू  अच्छा लगा क्युकी वह मेरा जन्म स्थान रहा और वह मेरे मासूमियत के दिन से किशोरावस्था तक का सफर तय हुआ कि कहीं यू अच्छा लगा क्युकी वहां बिना किसी रोक टोक के वो मेरे पास आ सकती थी। कहीं शादी के बाद पहला घोसला लगाया  और किश्त दे दे के घर भरा तो कहीं उससे दूर दोस्तो के साथ रात रात को तफरी काटे। सबका अपना मज़ा था और सब शहर अपने थे। 

शायद आप बड़े हो गए हो इसका पहला संकेत ये होता है जब शहर बेगाने होने लगते है। फिर से पुरानी जिदंगी जीने के लिए कभी पटना वापस भी गया, लेकिन मालूम चला कि जैसे मैंने शहर को पीछे छोड़ आया वैसे शहर भी मुझे पीछे छोड़ के आगे बढ़ चुका था। अलग अलग रास्ते पे बढ़े थे हम लोग इसलिए मुझे वो शहर और शहर  को में बेगाने लगने लगे थे। ये अनुभव नया था मेरे लिए। शायद इन शहरों के फोन बुक से मेरा नंबर डिलीट हो चुका था। वो गलियां डराती थी जहां से हाथ उड़ा के हवाओं के साथ दौड़ के निकला करता था। बस कभी कभी मौसम के रुख और त्योहारों के बाजों के साथ सुई की चुभन की तरह  टिस मार के यादें निकल जाया करती है। अभी कुछ समय से काम के सिलसिले में भोपाल आ रहा हूं, जब मौका मिलता है बस इस शहर को एक टक देखा करता हूं। बड़ी झील और शहर का सिमटता जा रहा जंगल। 

अपने इस दिवास्वप्न में डूबा सिर उठा के देखा तो हवाई अड्डा आ गया था, बड़े बड़े शब्दों में लिखा था कि "झीलों की इस नगरी में आपका स्वागत है",  अब ये झीलों नगरी जो बेगानी लगती है कभी मेरी अपनी थी...

Monday, July 30, 2018

निर्मला

अभी थोड़ी देर पहले  मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित उपन्यास निर्मला के आखिरी पन्ने खत्म हुए। आखों से आंसु ना रोक गए। शायद ये सप्ताह अवसाद में बीतेगा । फिर ज़िदंगी के कर्मो में व्यस्त हो जाऊंगा। भगवान निर्मला जैसा भाग्य दुश्मनों को भी ना दे ऐसी प्राथना करूंगा। बचपन में अनीता देसाई की एक किताब पढ़ी थी "Village by the sea" , उदास थी वो भी, लेकिन खत्म होते होते , चेहरे पे मुस्कुराहट ला गई थी। मुंशी जी इतने उदार ना थे, जाने ऐसा क्या हुआ होगा कि उन्होंने निर्मला लिखने का मन बनाया। शायद कई निर्मला को देखा होगा अपने इर्द गिर्द। अंग्रेजी साहित्य में जब स्नातक कर रहा था, तब पढ़ा था यूनानी और शकेस्पीयर त्रासदी का अंतर, कहीं किस्मत का खेल हुआ करता था तो कहीं चरित्र का दोष। प्रेमचंद के उपन्यास में अलग त्रासदी होती दिखाई दी, जिसे मैं तो वर्गीकृत करने का साहस बिल्कुल नहीं कर सकता हूं।

खैर एक पंद्रह साल की कन्या का बेमेल विवाह हो जाता है। बेमेल इसलिए नहीं कि उसके पति जैसा एक आदमी कुछ समय पहले तक निर्मला का पिता था, बेमेल इस लिए भी नहीं की पति दुगनी उम्र का तीन बच्चों का विधुर बाप था।  लेकिन बेमेल इसलिए क्यों की दुगनी उम्र होते हुए भी समझ आधी थी। यहां तक तो ये कहानी आज की ही लगती है, शायद मुंशी जी काल चक्र में यात्रा करना जानते थे, उन्हें मालूम था कि नौ दशक बाद भी ये कहानी यथार्थ लगेगी। हालांकि अब वक़्त थोड़ा सा बदला है। निर्मला के पति ने कभी निर्मला पे हाथ नहीं उठाया , अब के वाले तो कुट देते।

उपन्यास के किरदारों को रह रह के अपनी भूल का अहसास होता है, मालूम पड़ती है कि उस समय दुनिया संज्ञा शून्य ना हुई थी। आज तो लोग टूट पड़ते है, जब तक मांस ना नोच के खा ले और फिर दो चार ढकार ना ले चैन नहीं आता है।

खैर बहुत डर से सोच रहा हूं, पता नहीं निर्मला की बेटी का क्या हुआ होगा, शायद तोताराम जी किसी अच्छे कुल में ब्याह कर पाएं होएंगे, या पत्नी के शोक में उनके प्राण भी निकाल गए होंगे। शायद निर्मला की बेटी किसी अनाथ सेवा गृह में पल रही होगी, जहां किसी की कृपा से वो  पढ़ लिख कर बड़ी पदाधिकारी बनी होगी। लेकिन ऐसा भी हो सकता है मुज़फ़्फ़रपुर के ‘सेवा संकल्प बालिका गृह’ जैसे किसी जगह पे उसका दाह संस्कार हो गया हो। मुंशी जी भी ऐसे कठोर ना थे कि आज लिख पाते।

सोच रहा हूं, कितनी ही निर्मला मैंने भी देखी है और कभी ध्यान नहीं दिया, भुंगी की बेटी, ड्राइवर की बीवी। कल मां से बात करूंगा और पूछूंगा, शायद कुछ उन निर्मला का क्या हाल है उन्हें मालूम हो। अच्छा मालूम हुआ तो थोड़ा अवसाद काम होगा।

कैसे हम अपनी भावनाओं पे मरहम और आंखों पे पट्टी लगाते है। भरी दोपहरी में पर्दा लगा लेते है और घोर अंधेर में रोशनी कर लेते है। इतनी ही दुनिया है हमारी...

Wednesday, July 18, 2018

मुखाग्नि-भाग 2


माँ को ट्रेन से ही भाग 1 भेजा मैंने, थोड़ी देर बाद उनका सन्देश आया, बोली पढ़ा और बहुत रोना आया, फिर पुछा की और किसी को तो नहीं भेजे ना? जानें कौन बुरा मान जाएँ| औरत का मन ऐसा बना दिया है समाज ने, हमेशा डरा सा रहता है| मुझ नास्तिक के घर भी आती है तो अपने भगवान् को छुपा के रखती है| अब तो सोच रहा उनके लिए पूजा घर बनवा दूंगा, मेरी नहीं तो क्या उनकी श्रध्दा है| हाँ व्यर्थ के ढकोसले नहीं करने दूंगा कभी,  पेट में उल्सर है और बृहस्पत का व्रत करना है| खैर, मैंने कहा माँ चिंता मत करो तुम, जिसे अच्छा लगता हो अच्छा लगे जिसे ना लगता हो ना लगे, मैंने फेसबुक पे डाल दिया है| ट्रेन काफी लेट हो गयी थी मेरी, देर रात घर पंहुचा| छोटी बहनें बैठी थी, बोली बड़की माँ कुछ पढ़ के रो रही थी , क्या लिखा है आपने, हमे भी पढाओ| मैंने फ़ोन निकाल के दे दिया की पढ़ लो, बच्चे बदले तो शायद अगली पीढी बदले| थोड़ी देर में सबके आंखों से झर झर आंसूं निकलने लगे| रोते रोते गले लगा लिया उन्होंने, सबसे छोटी वाली तो इतना रोने लगी की सांस चढ़ने लगी उसकी, में थोडा घबरा भी गया था|

सुबह मुंडन होना था| दादी के लिए सादे रंग की साड़ी रखी हुई थी| सुबह सुबह चला गया में जहाँ मुंडन होना था| वह भी अजीब सा माहोल था, कुछ घड़े रखे हुए थे| मुझे अचानक बचपन की कुछ बातें याद आ गयी| सुबह सुबह मुझे बरसो पहले की एक घटना याद आई| बहुत साल पहले मेरे घर के सामने कुछ लोग, बाल छिलवा के एक घड़ा रख के गए थे, शायद कुछ रिवाज़ होगा , किसी के घर कोई मृत्यु हुई थी| मेरे दोस्तों ने बोला की तुम्हारे घर अब भूत आएगा, में काफी डर गया था| दादी को बताया तो उन्होंने उन लोगो से बोल के घड़ा हटवा दिया| में सोच रहा था उन्हें कैसा लगा होगा| हम भी कम क्रूर नहीं है’| हालाँकि बाद में बाबा को मालूम चला तो उन्होंने बोला किसी के दुःख के समय ऐसा नहीं करना चाहिए था|

में सलून में बाल छीलवाने आ गया, गाँव का नाई पे मुझे भरोसा नहीं था, साला बाल के साथ चमड़ी भी ना छील दे| घर वापस आया तो नाना बैठे थे| मैंने बोला मेरे कमरे में सो जाइये, हर्निया की परेशानी है दिल के मरीज भी| कमरे में नाना बाबा की कुछ और कहानी बताने लगे| बोले बहुत दया थी उनके मन में, लेकिन रौद्र रूप धारण कर ले तो कौन निरीक्षक और कौन महानिरीक्षक| एक कहानी बताने लगे, की गाँव से वो माँ को ले के आ रहे थे, रास्ते ने कंडक्टर नें कुछ जेवर चुरा लिए, पूछने पे चिल्ला चिल्ली करने लगा, डराने धमकाने भी लगा| नाना ने कुछ नहीं बोला, घर गए साइकिल उठाई और अपने मित्र के साथ गाँधी मैदान थाना आ धमके| बाबा उस समय वहां के थाना प्रभारी थे| नाना और बाबा की घनिष्ठ मित्रता भी थी| बाबा ने 4 सिपाही को जीप पे बिठाया और बस स्टैंड पहुच गए, उस समय पुलिस की जीप और थाना प्रभारी को देख के हरकंप मच गया| बस तो जा चुकी थी लेकिन बस के मालिक का पता चल गया था, टेलीफोन किया तो अगले दिन मालिक खलासी के साथ वही जेवर ले के आयां| बाबा ने खलाशी को समझा बुझा के जाने दिया की गरीब आदमी है| नाना ने बताया की वो बाबा की बात कभी नहीं काट सकते थे, उनके पिता जी ने मरते वक़्त बोला था की

“दामोदर आपके बड़े भाई है, समधी नहीं, उनकी बात भगवान् की बात समझना”|

मुझे भी याद आया की किसी रिश्तेदार की बेटी से बाबा मेरे बड़े मामा की शादी तय करने गए थे| मामा को शायद अभी शादी का मन नहीं होगा तो वो सीढियों ये निचे उतर रहे थे ये बोलने को| इतने में कमरे से बाबा की आवाज़ आई की
“गोपाल लड़की के पिता नहीं है, शादी कर दीजिये”|

बड़े मामा ने सुना तो अंदर नहीं गए, बोले पापा ( मेरे बाबा को पापा बोलते थे वो) ने बोल दिया तो बोल दिया|
बोलते बोलते थोडा भावुक हो गए नाना भी| फिर बताया की जब उन्हें दिल का दौरा पड़ा था उन्हें शायद बाबा सबसे पहले पहुचे थे, मामा को एटीएम दे के बोला पैसा की चिंता मत करना जो इलाज है करवाना, गोपाल को कुछ होना नहीं चाहिएमझे भी रहा नहीं गया सुन के, आँखें भर आई| आजकल लोग समधी का खून चूस लेते है, और बाबा सारा धन इलाज में लगाने को तैयार थे|

खैर आज बाल छिलवा के घर पंहुचा तो देखा की दादी सादे रंग की साड़ी पहन चुकी है| देख के लग रहा था की काफी रोई भी है| मेरा पारा चढ़ गया, गुस्से में स्टील की अलमारी पे एक घुसा दे मारामुझे भी भावनाये व्यक्त करना नहीं आता है| सीख रहा हूँ, बातचीत करना और गुस्सा कम करना|

खैर माँ और बाकी लोगो खरी खोटी भी सुनाई| उन्होंने बोला पंडित ने बोला है ऐसा करने को| जी में आया खून कर दूँ पंडित का| अगर एक खून माफ़ होता तो शायद कर भी देता| दुःख की घड़ी में जिस आदमी का हृदय इतना कठोर हो वो पंडित कैसा| बाद में लगा की माँ और चाची को क्या बोलता हूँ , जब दादी के बेटो को ये सब नहीं दीखता है तो और किसी को कोई क्या बोले| धर्म के नाम पे क्या क्या खेल होता है| शायद सबकी अपनी मजबूरियां है, में तो चला जाऊंगा बाकी लोगो को इसी समाज में रहना है, लेकिन फिर भी मन नहीं मान रहा , थोड़ी हिम्मत करके लोग ये ढकोसले बंद करा सकते हुई| पिताजी को सुबह बोलने की कोशिश की तो उन्होंने कहा

“ उनके बेटे है , जो करना है करने दो, तुमको जो करना होगा करना” सुन के हाड़ कांप गयी|

दादी ने थोड़े देर बाद बुलाया मुझे| बोली तुम जो होली में साड़ी लायें थे वही पहनूंगी कल , पंडित को कुछ ना बोलना| बाद में छोटी बहन लोगो ने बताया की कैसे पंडित ने आग में मूत के रखा है, पाठ करता है और बातें करता है की “जिस घर में नारी की आवाज़ बाहर सुनाई दे , वैसे घर का विनाश निश्चित है” , मैंने बोला कूट क्यों नहीं दिया वही पे, कमजोर सा तो दीखता है, तुम लोगो की संख्या भी ज्यादा है| तो कहने लगी की नहीं भैया बहुत बड़ा शस्त्र है उसके पास, शास्त्र बोलता है उसको, कुछ पूछो तो बोलता है ये देखो ये इस किताब में लिखा है, और लोग प्रणाम करते है उस किताब को| मैंने पुछा, पढ़ा क्या किसी ने किताब को? तो बोलने लगी नहीं भैया पढ़ा तो नहीं है|

वैसे काफी अच्छा व्यापारी भी है पंडित, वक़्त देख के सौदा करता है, ख़ुशी ज्यादा हो या दुःख, रेट उसका नहीं बदलता| साड़ी एकदम सफ़ेद होनी चाहिए, नहीं तो आत्मा को शान्ति नहीं मिलेगी| सारें जीवन का पुण्य एक तरफ और साडी का रंग एक तरफ| क्या क्या चाहिए उसको, पलंग, कूलर, गाय और सोने की अंगूठी गाय की सींग में होना जरूरी है| लोग सुन भी रहे है दे भी रहे है| मेरे सामने अभी नहीं आया है, नहीं तो शायद उसकी पंडिताई झाड़ दूँ| शायद आदमी पहचानता है वो , दूर रहता है मेरे से|

बाबा की एक कहानी याद आ गयी, सुना के ये भाग ख़त्म करूँगा| बचपन में सुना था केले के पेड़ पे ब्रम्ह प्रेत रहता है, हमारा मकान बन रहा था उस समय, कोने में एक केले का पेड़ था| रात में उधर जानें में डर लगता था| बाबा को मालूम चला तो उन्होंने बोला

“प्रेत है की नहीं ये मालूम नहीं, लेकिन ये तय है, जितना डरोगे उतना डराएगा ये प्रेत”|

आज ये ये कहानी चरिथार्थ मालूम पड़ती है...

Tuesday, July 17, 2018

मुखाग्नि-भाग 1



पिछले ऐतवार की बात है, घर पे बैठा टेलीविज़न देख रहा था की माँ का फोन आया| उठाया तो रो रही थी की बाबा की सांस नहीं चल रही है| मैंने बोला घबराइए नहीं,  नहीं तो दादी घबरा जाएँगी, दिल तो मेरा भी धक् से करके रह गया लेकिन शान्ति से काम ले, अपने डॉक्टर दोस्त को फ़ोन किया, उसने बोला की माँ का फ़ोन आया था, और जैसा वो बता रही है उसके हिसाब से बुरी खबर जान पड़ती है| मुझे समझ में नहीं आ रहा था क्या हो रहा है, अंदर गया तो बीवी सो रही थी, मैंने जगाया नहीं| चुपचाप दुसरे कमरे में गया और रोया| इसके पहले ऐसे किसी व्यति का देहांत नहीं हुआ था जिससे मुझे फर्क पड़ता हो| तब तक माँ ने बता दिया की डोक्टर देख के गया है और बाबा नहीं रहें| काफी देर रोया , भाई को फ़ोन किया, वो भी रो रहा था, बोला मैंने घर आ जाओ, साथ पटना चलते है| आनन फानन में टिकट बुक किया| रात भर नींद नहीं आई, बाबा के बारें में सोचता रहा|

पिताजी मेरे काफी समय तक पढाई करते रहे, कमाना देर से शुरु किया था , बाबा नें ही मेरी पढाई करवाई थी| एक एक करके बचपन की सब बातें याद आ रही थी| बाबा मेरे पुलिस में थे , एक बार याद है मुझे छोटा था में, बाबा बारिश में भींग गए थे ड्यूटी से आनें में, वर्दी सब सूखने को डाल के रिवाल्वर टेबल पे रख दिए थे| गोलियां अलग रही थी, शायद सुखाना होगा इसीलिए बाहर रहने दिया होगा| मेरा जिज्ञासु मन, छोटा था में रिवाल्वर उठा के खेलने लगा , बाबा ने देखा तो पिटाई हुई, शायद वही पिटाई थी जो 15 साल बाद जंगल बिहार में बन्दुक से दूर रखी, नहीं तो 200 रुपये में स्कूल में एक लड़का देसी कट्टा बेचता था| खैर काफी कहानिया है|

बहुत साल बाद दुसरे ज़ात की लड़की से शादी कर रहा था, बाबा को जा के बताया, खूब खुशी हुई उनको| कुछ नए लोग नहीं आये, लेकिन बाबा शादी में मंडप के सामने रात भर बैठे रहे, बहुत बार आँखें भर आई थी उनकी खुशी से| बहुत मजबूत आदमी थे, उन्ही ने सिखाया की जो सही लगता है करो , दुनिया के ढकोसलो से मत घबराओ| कम बोलते थे लेकिन बोलते थे तो सब सुनते थे| बहुत समय तक उनके सामने बैठता नहीं था, डर से नहीं इज्जत से|

दुसरे दिन पटना पंहुचा तो घर जाने में डर लग रहा था , ईया (दादी) की बस चीख सुनाई दे रही थी| लोग इधर उधर टहल रहे थे| में घर क पीछे चला गया, अंदर जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी| बहुत देर बाद अंदर गया में, दादी का बुरा हाल था, बार बार बेहोश भी हो जा रही थी| सब चुप बैठे थे, माँ ने बताया रात भर से रो रही है, खुद को कोस रही थी की उन्होंने ध्यान नहीं रखा| रोना स्वाभाविक था, लेकिन बाकी लोगो का चुप रहना और उन्हें ये ना समझाना की नहीं आपके कारण कुछ नहीं हुआ है मुझे अच्छा नहीं लगा| नारी को हमारें समाज में अबला बना कर रखा है लोगो ने, पति की मृत्यु के बाद बेचारी बनाने का सारा इन्तेजाम कर रखा जाता है। बहुत देर बाद में गया दादी के पास, पार्थिव शारीर बिजली वाले ठंढे ताबूत में रखा था| दादी रात भर पकड़ के रोती रही थी उसको| समझाने का प्रयत्न किया, आंसू नहीं आने दिए, सोचा में रोऊंगा तो और रोएंगी| रोना आता था तो अंदर कमरे में जा क रो लिया करता था| दादी को वहां से हटाने का प्रयत्न किया, लेकिन वो कहा हटने वाली थी बोली नहीं नहीं मत हटाओ, में नहीं रोउंगी, बस बैठे रहने दो यही, आधे सदी से साथ थे दोनों, इतनी जल्दी नहीं जाने देने वाली थी वो| इतने में कुछ लोग आयें और रोते चीखते हुए दादी से गले लगने लगे | मुझे बहुत गुस्सा आया की बड़े डर बाद चुप हुई थी फिर रो देंगी इसीलिए 2-3 बार चिल्ला भी दिया लोगो पे| दादी के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा था, बाकी दुनिया का कोई मतलब नहीं था मुझे|
बहुत देर बाद सब बक्सर के लिए निकले , खानदान में सबका दाह संस्कार वही हुआ था इसीलिए इतना इंतज़ार हुआ, पटना में करते तो शायद दादी थोड़ा कम रोती।

पहली बार शमशान घाट गया था, समझ में नहीं आया क्या हो रहा था, पण्डे झगडा कर रहे थे की आपका गाँव का पंडित नहीं करवाएगा पूजा, हमारा घाट है| रिश्तेदार पंडिताई झाड़ रहे थे, चिल्ला चिल्ली हो रही थी, एक गाँव का लड़का तो चिता पे रखने क बाद सेल्फी भी ले रहा है| लिखते हुए भी इतना गुस्सा आ रहा है, उस समय कैसे खुद को रोका मारने से में ही जानता हूँ| सबपे गुस्सा आ रहा था, सोच रहा था की प्रलय हो जाये सब मर जाएँ वहीँ पे| कुछ देर में लोग बात करने लगे की देवदार की लकड़िया कितनी अच्छी जलती रही है जैसे पेट्रोल हो| मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था| सामने आसमान लाल था, गंगा की गंदगी उस लाली में दिख नहीं रही थी, चिता इतनी तेज़ थी की अपवर्तन से दूर नज़र डालने पे आसमान धूमिल हो रही थी| कुछ वक़्त के लिए साब शांत हो गए थे, पण्डे, गाँव के लोग, बस डोम लगा हुआ था की शारीर अच्छे से जल जायें, वैतरणी पार करना था| पिताजी बस बैठे हुए थे| बाबा कुछ समय से बीमार चल रहे थे, मुझे मालूम था की अब बस समय की बात है , लेकिन पिताजी लगे रहते थे, सुबह 4 बजे से दिन शुरु होता था उनका, बाबा को नहला धुला के बिठा देते थे, नास्ता खिला के भजन सुनते थे फिर कोर्ट जाते थे, दिन में 2 बार वापस आतें थे खाना खिलाने, बात करते थे| रात में 2 बार उठ के करवट बदलते थे बाबा का| मुझे बोलते थे देख लेना ठीक कर दूंगा में सेवा कर के| लिखते लिखते कंप्यूटर से स्क्रीन धूमिल गयी मेरी|

वापस घर आनें वक़्त हँसी मज़ाक चल रहा था, लेकिन शायद ऐसे ही हमारे समाज में दर्द छुपाना सिखाया गया है मर्दों को, या शायद ऐसा ही होता हो, लोग भूल जातें है| में नहीं भूलना चाहता हूँ| में याद रखना चाहता हूँ| कुछ बाबा की कहानियाँ भी सुनने को मिली रास्ते में, जब बाबा जवान थे, किसी की शादी थी गाँव में, डकैत आने की आशंका थी, रात भर रिवाल्वर ले के अकेले बैठे रहे बाबा, खैर डकैत किसी और घर लूट कर चले गए, वैसे 15 दिन के अंदर बाबा के ने पकड़ लिया था उन्हें , थाने में बंद कर के धुलाई भी की| सोचने की कोशिश की वो दिन कैसा होगा , लेकिन आज का दिन जा नहीं रहा था आँखों से, बस कुछ राख बची अंतिम में, गंगा में डाल के लौट रहे थे हमलोग|

अब बस दादी की चिंता थी, अगले 10 दिन धर्म के नाम तमाशा होगा, दान होगा , दादी को दिन रात याद दिलाया जायेगा की उनके पति नहीं रहे| बहुत क्रूर समाज है हमारा, पंडित पंडिताई करेगा और हम सब मानेंगे सोच के की कुछ गलती ना हो जाये, आत्मा की शान्ति भी जरूरी है| में बनारस चला आया कुछ दिन काम से, सोचा मुझसे नहीं देखा जायेगा ये ढकोसले, पंडित और गाँव के लोगो तो मार दूंगा तो अलग काण्ड होगा, दिन भर काम करता था, रात में भांग पी के सो जाता था| काफी सोचने को मिला इन कुछ दिनों|
ट्रेन में हूँ घर जा रहा हूँ , श्रध्कर्म है| बस दादी को पकड़ के बोलूँगा की दादी, तुमहारे सामने बड़े बड़े की बोली नहीं निकलती है, ऐसा मत सोचना आज भी कुछ बदला है, ऐसे ही रहना, आग लगे दुनिया में|

शायद ना भी बोल पाऊ, मर्दों को ज्यादा भावना व्यक्त करना नहीं सिखाया है, ज्यादा भावना दिखाने वाला नपुंसक जो होता है, ऐसा ही सुना है मैंने| शायद बोल भी दूँ, बाबा अपनी भावनाएं दिखाते थे, बहुत बार दुःख या ख़ुशी में उनकी आँखे चमक जाती थी, कोने से देखा है मैंने...