Thursday, December 27, 2018

वो सारे शहर जो बेगाने हो गए

अपनी अभी तक की छोटी सी जिदंगी में कुछ 6 शहरों में रहा हूं में। पटना, भोपाल, दिल्ली, अंगुल, हैदराबाद, और नोएडा। हर शहर की अपनी कुछ बात थी। जीवन के अठारह बसंत पटना में बिताने के बाद जब पढ़ाई करने पहली बार भोपाल गया तो अलग खुशी थी। दो साल वहां गुजरे मेरे और पहली बार एक अलग तरह की आजादी का अनुभव हुआ। ना कोई देखने वाला ना कोई रोकने वाला। उन दो सालों में काफी कुछ किया, पढ़ाई तो खीच तान के की किसी तरह  लेकिन बाकी कुछ बिना खीचा तानी के हुई। नया शहर, नए दोस्त और नई आदते। शहर छान मारा, एम पी नगर से ले के दस नंबर मार्केट, कभी बित्थन कभी न्यू मार्केट। आजादी का पूरा फायदा उठाया। शहर आपना सा लगने ही लगा था कि पढ़ाई ख़त्म हो गई और अलविदा कहने का वक़्त आ गया।

पढ़ के निकला तो नौकरी करनी शुरू की, माता पिता का जो सेफ्टी नेट होता है वो धीरे धीरे ओजोन की परत की तरह पतला होता जा रहा था। ज़िदंगी जब आटे चावल और पिज़्ज़ा का भाव बता रही थी , पर हर शहर ने खुले हाथो से गले लगाया। जैसे जैसे शहर बदलता गया हर शहर की अपनी बातें बनती गई। काफी शहर में लोगों से शिकायते रही लेकिन शहर से कभी नहीं। इक अलग सा लगाव होता रहा। काफी जगह लगाव की भावनाओं ने शहर छोड़ने के बात दस्तक दी लेकिन भावना रही जरूर। कहीं यू  अच्छा लगा क्युकी वह मेरा जन्म स्थान रहा और वह मेरे मासूमियत के दिन से किशोरावस्था तक का सफर तय हुआ कि कहीं यू अच्छा लगा क्युकी वहां बिना किसी रोक टोक के वो मेरे पास आ सकती थी। कहीं शादी के बाद पहला घोसला लगाया  और किश्त दे दे के घर भरा तो कहीं उससे दूर दोस्तो के साथ रात रात को तफरी काटे। सबका अपना मज़ा था और सब शहर अपने थे। 

शायद आप बड़े हो गए हो इसका पहला संकेत ये होता है जब शहर बेगाने होने लगते है। फिर से पुरानी जिदंगी जीने के लिए कभी पटना वापस भी गया, लेकिन मालूम चला कि जैसे मैंने शहर को पीछे छोड़ आया वैसे शहर भी मुझे पीछे छोड़ के आगे बढ़ चुका था। अलग अलग रास्ते पे बढ़े थे हम लोग इसलिए मुझे वो शहर और शहर  को में बेगाने लगने लगे थे। ये अनुभव नया था मेरे लिए। शायद इन शहरों के फोन बुक से मेरा नंबर डिलीट हो चुका था। वो गलियां डराती थी जहां से हाथ उड़ा के हवाओं के साथ दौड़ के निकला करता था। बस कभी कभी मौसम के रुख और त्योहारों के बाजों के साथ सुई की चुभन की तरह  टिस मार के यादें निकल जाया करती है। अभी कुछ समय से काम के सिलसिले में भोपाल आ रहा हूं, जब मौका मिलता है बस इस शहर को एक टक देखा करता हूं। बड़ी झील और शहर का सिमटता जा रहा जंगल। 

अपने इस दिवास्वप्न में डूबा सिर उठा के देखा तो हवाई अड्डा आ गया था, बड़े बड़े शब्दों में लिखा था कि "झीलों की इस नगरी में आपका स्वागत है",  अब ये झीलों नगरी जो बेगानी लगती है कभी मेरी अपनी थी...