अभी थोड़ी देर पहले मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित उपन्यास निर्मला के आखिरी पन्ने खत्म हुए। आखों से आंसु ना रोक गए। शायद ये सप्ताह अवसाद में बीतेगा । फिर ज़िदंगी के कर्मो में व्यस्त हो जाऊंगा। भगवान निर्मला जैसा भाग्य दुश्मनों को भी ना दे ऐसी प्राथना करूंगा। बचपन में अनीता देसाई की एक किताब पढ़ी थी "Village by the sea" , उदास थी वो भी, लेकिन खत्म होते होते , चेहरे पे मुस्कुराहट ला गई थी। मुंशी जी इतने उदार ना थे, जाने ऐसा क्या हुआ होगा कि उन्होंने निर्मला लिखने का मन बनाया। शायद कई निर्मला को देखा होगा अपने इर्द गिर्द। अंग्रेजी साहित्य में जब स्नातक कर रहा था, तब पढ़ा था यूनानी और शकेस्पीयर त्रासदी का अंतर, कहीं किस्मत का खेल हुआ करता था तो कहीं चरित्र का दोष। प्रेमचंद के उपन्यास में अलग त्रासदी होती दिखाई दी, जिसे मैं तो वर्गीकृत करने का साहस बिल्कुल नहीं कर सकता हूं।
खैर एक पंद्रह साल की कन्या का बेमेल विवाह हो जाता है। बेमेल इसलिए नहीं कि उसके पति जैसा एक आदमी कुछ समय पहले तक निर्मला का पिता था, बेमेल इस लिए भी नहीं की पति दुगनी उम्र का तीन बच्चों का विधुर बाप था। लेकिन बेमेल इसलिए क्यों की दुगनी उम्र होते हुए भी समझ आधी थी। यहां तक तो ये कहानी आज की ही लगती है, शायद मुंशी जी काल चक्र में यात्रा करना जानते थे, उन्हें मालूम था कि नौ दशक बाद भी ये कहानी यथार्थ लगेगी। हालांकि अब वक़्त थोड़ा सा बदला है। निर्मला के पति ने कभी निर्मला पे हाथ नहीं उठाया , अब के वाले तो कुट देते।
उपन्यास के किरदारों को रह रह के अपनी भूल का अहसास होता है, मालूम पड़ती है कि उस समय दुनिया संज्ञा शून्य ना हुई थी। आज तो लोग टूट पड़ते है, जब तक मांस ना नोच के खा ले और फिर दो चार ढकार ना ले चैन नहीं आता है।
खैर बहुत डर से सोच रहा हूं, पता नहीं निर्मला की बेटी का क्या हुआ होगा, शायद तोताराम जी किसी अच्छे कुल में ब्याह कर पाएं होएंगे, या पत्नी के शोक में उनके प्राण भी निकाल गए होंगे। शायद निर्मला की बेटी किसी अनाथ सेवा गृह में पल रही होगी, जहां किसी की कृपा से वो पढ़ लिख कर बड़ी पदाधिकारी बनी होगी। लेकिन ऐसा भी हो सकता है मुज़फ़्फ़रपुर के ‘सेवा संकल्प बालिका गृह’ जैसे किसी जगह पे उसका दाह संस्कार हो गया हो। मुंशी जी भी ऐसे कठोर ना थे कि आज लिख पाते।
सोच रहा हूं, कितनी ही निर्मला मैंने भी देखी है और कभी ध्यान नहीं दिया, भुंगी की बेटी, ड्राइवर की बीवी। कल मां से बात करूंगा और पूछूंगा, शायद कुछ उन निर्मला का क्या हाल है उन्हें मालूम हो। अच्छा मालूम हुआ तो थोड़ा अवसाद काम होगा।
कैसे हम अपनी भावनाओं पे मरहम और आंखों पे पट्टी लगाते है। भरी दोपहरी में पर्दा लगा लेते है और घोर अंधेर में रोशनी कर लेते है। इतनी ही दुनिया है हमारी...
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